

एक ज़ेन साधक अपने समय का जाना-माना योद्धा था। वृद्धावस्था में वह सारा समय ध्यान में और शिष्यों के बीच बिताता था। उन्हीं दिनों एक नौजवान योद्धा की काफ़ी धूम थी। वह अत्यंत कुशल लड़ाका था और अच्छे-अच्छे उसके सामने टिक नहीं पाते थे। चतुर भी था। एक दिन ऐसा आया कि इस वयोवृद्ध ज़ेन साधक योद्धा के अलावा सब नामी योद्धाओं को पराजित कर चुका था।
‘तो इसे भी क्यों छोड़ूं’ नौजवान योद्धा...
![]() मणिपुर की इरोम शर्मिला के ऐतिहासिक आमरण अनशन का दसवां साल शुरू हो चुका है। शर्मिला की एक ही मांग है- मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम हटाया जाए। वे भूख हड़ताल पर क्यों अड़ी हैं, और सरकार आख़िर क्यों उनकी मांग नहीं मान रही है ? इस पूरे मामले पर एक नजर..
ह नवंबर का दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए ही नहीं, अध्यापकों और कर्मचारियों के लिए भी लंबे समय तक यादगार बना रहेगा। इस दिन विश्वविद्यालय के...
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रोमांच के शौकीन कुछ दोस्त अफ्रीका के जंगलों में घूमने गए थे। उन्होंने उस क्षेत्र के बारे में पर्याप्त जानकारी जुटा ली और फिर जंगल में भटकने के लिए निकल पड़े। वे कैंप से काफ़ी दूर निकल आए थे। यहां-वहां फिरते, ख़ूबसूरत नÊारों को निहारते हुए उन्हें पता ही नहीं चला कि वे जंगल के किस हिस्से में पहुंच गए हैं।
जंगल घना था, रोशनी भी कम थी। इसी बीच वे एक नई दिशा में बढ़ने लगे। अब उनका लक्ष्य किसी भी तरह वहां से बाहर निकलना था। जब एक पगडंडी दिखी, तो दोस्तों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे उसी राह पर बढ़ चले। लेकिन यह क्या! कुछ दूर जाने के बाद पगडंडी दो भागों में बंट गई थी और सामने एक जंगली खड़ा था।
उन लोगों को इतना पता था कि जंगल में दो जनजातियों के कबीले हैं। दोनों लगते तो एक समान हैं, पर उनके स्वभाव में Êामीन-आसमान का अंतर है। एक कबीले में अगर कोई अजनबी पहुंच जाए, तो वे उसका ख़ूब स्वागत-सत्कार करते हैं। इसके उलट, दूसरे कबीले में भूले से भी पहुंच जाने वाला व्यक्ति जीवित वापस नहीं आता, वे उसे मारकर खा जाते हैं। उनमें एक और फ़र्क़ था। भले कबीले वाले हमेशा सच बोलते थे, जबकि...
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रोली ने दूर की सोची और एहसास किया कि वह जब तक यहां काम करेगी, यह पाजी पंडित ऐसी ही बातें करेगा। वह जानती थी, सुनील किसके बारे में ये बातें कह रहे हैं। ये सारी ग़लतियां रंजीत सर में हैं..
रोली शर्मा के अकड़ू और Êिाद्दी होने की बात आजकल सबको पता चल गई है। अभी-अभी रंजीत सर ने भी उसे उसके Êिाद्दीपन के लिए डांट लगाई...
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![]() मुशायरे हों या साहित्यिक समारोह, शायरों और अदीबों के हवाले से अक्सर कई दिलचस्प वाक़यात होते हैं। तऱक्क़ी पसंद अदीबों की एक कॉन्फ्रेंस हैदराबाद में हुई। इसमें बंबई के प्राय: सभी अदीब शायर मौजूद थे। उस समय तऱक्क़ी पसंद तहरीक के बानी अली सज्जाद ज़हीर (बन्ने भाई) थे तथा यह कॉन्फ्रेंस उन्हीं के नेतृत्व में हो...
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