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Beijing Olympics, 2008 Beijing Olympics, 2008 नयी दिल्ली.
ओलिंपिक इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने का मौका उनके सामने था। लेकिन भारत के महान खिलाड़ियों में शुमार उड़न सिख, मिल्खा ¨सह और उड़न परी पीटी ऊषा बेहद मामूली अतंर से यह मौका चूक गए थे। मिल्खा के 1960 के रोम ओलिंपिक में और उषा के 1984 के लास एंजेलिस ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतने का मौका चूकने के बाद देश को सदैव इस बात का अफसोस रहा है कि ये महान एथलीट कैसे ये मौका चूक गए। मिल्खा या ऊषा यदि ये मौके भुना जाते तो वे १९क्क् के पेरिस ओलिंपिक में नार्मन प्रीचार्ड के बाद कोई एथलेटिक्स पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बन जाते।
प्रीचार्ड ने पेरिस ओलिंपिक में २क्क् मी, और २क्क् मी बाधा दौड़ में दो रजत पदक जीते थे।१९६क् के रोम ओलिंपिक में मिल्खा ने 400 मी. दौड़ में पहली हीट में 47.6 सेंकड का समय निकाला और दूसरे स्थान पर रहे। दूसरे राउंड की हीट में मिल्खा ने कुछ और सेकंड घटाए तथा वह46.5 सेकंड का समय लेकर जर्मनी के कार्ल काफमैन के बाद दूसरे स्थान पर रहे। सेमीफाइनल में मिल्खा अमेरिका के ओटिस डेविस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दौड़े। इस बार भी उन्होंने कुछ सेकंड घटाए और ४५.९ सेकंड के समय के साथ दूसरे स्थान पर रहे।
फाइनल में मिल्खा ने ब्लाक से जोरदार शुरुआत की और बढ़त बना ली। लेकिन मध्यदूरी तक वह कुछ धीमे पड़ गए और यही उनके लिए घातक साबित हुआ। अन्य एथलीट उनके पास से निकलने लगे। अपनी गलती को महसूस करते हुए मिल्खा ने फिर आखिरी फर्राटे में अपनी सारी ताकत झोंक दी, लेकिन जो नुकसान वह पहले कर चुके थे उसकी वह भरपाई नहीं कर पाए।
उस दौड़ का स्तर कितना ऊंचा था, उसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता था कि ओटिस और काफमैन 44.8 सेकंड का समय निकालकर क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर रहे। दक्षिण अफ्रीका के मेल स्पेंस 45.5 सेकंड के साथ तीसरे स्थान पर रहे। मिल्खा 45.6 सेकंड के साथ चौथे स्थान पर रहे और सेकंड के अंतर से कांस्य पदक से चूक गए।
उन्होंने हीट से लेकर फाइनल तक 47.6, 46.5, 45.9 और 45.6 सेकंड का समय निकाला और लगातार अपने प्रदर्शन में सुधार किया। मिल्खा के लिए यह कहा जाता था कि वह रेस दौड़ते नहीं थे बल्कि जैसे उड़ते थे। यही कारण था कि उनका नाम मिल्खा ¨सह पड़ गया था। उस रेस के बारे में मिल्खा ने बाद में कहा था कि उन्हें लगा कि वह शुरुआत में अंधाधुंध तेज दौड़े, उन्होंने फिर खुद को कुछ धीमा किया 1 लेकिन यही उनकी भारी भूल साबित हो गई। मिल्खा के बाद यदि किसी एथलीट ने ओलिंपिक में भारत का नाम रोशन किया तो वह पी टी ऊषा थी।
मिल्खा को जहां उड़न सिख, कहा जाता था वहीं ऊषा को उड़न परी कहकर बुलाया जाता था। भारत में एथलीटों की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित करने वाली ऊषा भी मिल्खा की तरह ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतने से मामूली अंतर से चूक गई थी। १९८४ के लास एंजेलिस ओलिंपिक में उषा 400 मी. बाधा दौड़ के फाइनल में पहुंचकर किसी ओलिंपिक स्पर्धा के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनी थी। उस समय पूरा देश उनसे एक नया इतिहास रचने की उम्मीद कर रहा था, लेकिन तीसरे स्थान के लिए फोटो फिनिश में वह सेकंड के सौंवे हिस्से से कांस्य पदक जीतने से चूक गई। ऊषा ने अपने कैरियर में सब कुछ हासिल किया, लेकिन ओलिंपिक पदक नहीं जीत पाने का दुख उन्हें हमेशा रहा।