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केंद्र की लड़ाई माया ले जाएंगी राज्यों में

नई दिल्लीपरमाणु करार पर अचानक बदले राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरण सूबाई सियासत की भी तस्वीर बदल सकते हैं। बसपा, माकपा और तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) इसके लिए ठोस कार्ययोजना पर विचार कर रहे हैं। 22 जुलाई को प्रस्तावित विश्वास मत के बाद इन पार्टियों के नेता अन्य दलों और समूहों को भी अपनी नई राजनीतिक मुहिम से जोड़ने की कोशिश करेंगे। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक आम तौर पर गठबंधन या तालमेल के बगैर चुनाव लड़ने वाली बसपा कुछ राज्यों में सीटों के तालमेल के लिए भी तैयार हो सकती है। इससे कांग्रेस और भाजपा से अलग तीसरा मोर्चा बनाने की नई पहल को बल मिलेगा। इस सिलसिले में आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, माकपा महासचिव प्रकाश करात और बसपा प्रमुख मायावती के बीच शुरुआती बातचीत हो चुकी है।

कांग्रेस, सपा से नाराज

बसपा सूत्रों ने बताया कि मायावती इस बार कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। सपा का साथ मिलते ही कांग्रेस ने सरकारी स्तर पर उन्हें जिस तरह सीबीआई के जाल में फंसाने की योजना बनाई, उससे मायावती बेहद नाराज हैं। इस बार मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली बसपा के खास निशाने पर हैं। महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में भी नए राजनीतिक समीकरण गढ़ने की कोशिशें हो रही हैं।

पिछले चुनाव में मध्यप्रदेश में उसे 7.१ फीसदी वोट मिले थे, लेकिन सीटें मिलीं केवल दो। दिल्ली में उसे पिछली बार 5.7 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन सीट नहीं मिली। इस बार दोनों प्रदेशों में वह अपना राजनीतिक प्रदर्शन सुधारने में जुटी हुई है। बताया जाता है कि बसपा की कोशिश मध्यप्रदेश में दलितों के साथ अति पिछड़ों में आधार बनाकर सवर्णो की तरफ बढ़ना है। छत्तीसगढ़ में बसपा का इरादा यहां कांग्रेस की फूट का फायदा उठाना है। चुनाव से पहले अगर कांग्रेसी गुटों में सुलह नहीं हुई तो बसपा की चांदी रहेगी।





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