जयपुर.
दुनिया की चर्चाओं में समय गंवाने और उसमें मग्न रहने की अपेक्षा जवाहरात व्यवसायी कुशलचंद हीरावत ने एक ऐसी तपस्या धारण की, जिसके तहत पिछले डेढ़ साल से उन्होंने मौनव्रत धारण किया हुआ है। परिजनों ने उन्हें खूब समझाया, लेकिन वे मौनव्रत पर कायम हैं।
श्री जैन रत्न युवक परिषद के परामर्शदाता अशोक सेठ ने बताया कि मौन व्रत के पीछे व्यक्ति का उद्देश्य रहता है कि वह दुनियादारी में समय बिताने की बजाय खुद को देखे। पढ़ने, लिखने और स्वाध्याय में समय बिताए, ताकि इसका फल समाज को मिल सके।
कुशलचंद के पुत्र डॉ. राकेश हीरावत ने बताया कि पिताजी को गुरुदेव हस्तीमलजी से मौनव्रत की प्रेरणा मिली। पहले वे केवल सोमवार को ही मौनव्रत रखते थे। इसके बाद उन्होंने सात दिन का, फिर चातुर्मास में मौनव्रत रखना शुरू किया। एक दिन जब उन्होंने बताया कि वे अब हमेशा मौनव्रत रखेंगे तो सुनकर दंग रह गए और पिताजी ने 1 जनवरी 2007 से अपनी मौन तपस्या प्रारंभ कर दी।
हम आठ घंटे मौन रखेंगे
कुशलचंद के मौनव्रत की बात सुनकर उनकी पत्नी प्रवेशदेवी ने भी उन्हें खूब समझाया। यहां तक कह दिया कि आप मौनव्रत में एक पहर या एक घंटे बोलने की छूट रखें, ताकि हम घर परिवार की बातें आपसे कर सकें। प्रवेशदेवी ने कहा कि अगर आप एक घंटे मौनव्रत तोड़ेंगे तो परिवार के सभी आठ सदस्य एक-एक घंटे का मौनव्रत रखेंगे। तब कुशलचंद ने अपनी पत्नी को बस इतना कहा कि आप मेरा मौनव्रत क्यों तुड़वाते हो। अगर सब लोगों को मौन साधना अच्छी लगती है तो सभी क्यों नहीं कर लेते।
कुशलचंद हीरावत का परिचय
हीरावत भवन जौहरी बाजार में रहने वाले कुशलचंद का जन्म अगस्त 1942 में हुआ था। मैट्रिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद जवाहरात का काम शुरू किया। 1965 में शादी के बाद प्रत्येक सोमवार को मौन धारण करने का संकल्प लिया। 1981 में 100 लोगों से अधिक का भोज आयोजित नहीं करने और ऐसे भोज में शामिल नहीं होने का संकल्प लिया।
20 साल तक रखा था मौन
अशोक सेठ ने बताया कि अमरचंद हीरावत ने 20 सालों तक मौन व्रत किया था, लेकिन पिछले 25 सालों में कुशलचंद का मौनव्रत सबसे बड़ा है।