bhaskar Web English
HomeNewsNational National

सरकारी ऑफर से दूर रहें रिटायर जज

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायरमेंट से पूर्व राज्यपाल या किसी न्यायाधिकरण में नियुक्ति का कोई भी सरकारी ऑफर स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह विचार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जेएस वर्मा के हैं। उन्होंने कहा कि वे रिटायरमेंट से पहले जजों को ऐसा कोई ऑफर पेश किए जाने के भी खिलाफ हैं।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि इस तरह के ऑफर पेश करने पर रिटायरमेंट से पहले जजों के कामकाज पर असर पड़ने की आशंका बनी रहती है। जस्टिस वर्मा ने शीघ्र रिटायर होने वाले जजों को दिए जाने वाले ऐसे प्रस्तावों को हतोत्साहित करने पर जोर देते हुए कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट के जजों को कोई ऐसा पद स्वीकार नहीं करना चाहिए, जिसके कार्यकाल का निर्धारण कार्यपालिका अपनी इच्छा से करती हो। चाहे उन्हें इसका प्रस्ताव ही क्यों न मिला हो।’

रिटायरमेंट के बाद भी तय हो जवाबदारी : जस्टिस वर्मा ने 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे एक पत्र का हवाला देते हुए रिटायरमेंट के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के जजों के कामकाज को न्यायिक जवाबदारी के अंतर्गत लाने की बात कही। जस्टिस वर्मा ने रिटायर्ड जजों द्वारा किसी मामले में मध्यस्थता या सलाह- मशविरे का कार्य करने पर भी एतराज जताया है।

कार्य प्रभावित : जस्टिस वर्मा के विचारों का समर्थन विधि मंत्रालय की संसदीय स्थाई समिति के अध्यक्ष ईएमएस नचिअप्पन ने भी किया है। नचियप्पन ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के रिटायरमेंट की उम्र को मौजूदा 62 से बढ़ाकर 65 किए जाने का प्रस्ताव किया है।

ऐसी धारणा है कि रिटायरमेंट से पहले कुछ विशेष जिम्मेदारियों का ऑफर पाने के बाद जजों का झुकाव नीति-निर्माताओं की तरफ हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार रिटायर्ड जजों के ज्ञान का लाभ लेने के लिए उन्हें ताउम्र पूरा वेतन व अन्य सुविधाएं प्रदान कर सकती है।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: