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न आतंकी अट्टहास सुनाई पड़ता है, न करुण क्रंदन

आतंकी अट्टहास कर रहे होंगे सुदूर कहीं किसी बागीचे में टहलते हुए- कि कानून के रखवाले उन्हें छू तक न सके। जयपुर में विस्फोटों के दो माह बीत गए। इसी तरह दो वर्ष भी गुजर जाएंगे। हमारे सत्ताधीश चाहते हैं हम इसे डरावना स्वप्न समझकर भूल जाएं। प्रतिपक्ष के वाचाल नीतिज्ञ भी तत्पर हैं कि अपने ऊपर हुए आतंकी हमले को हम याद न रखें। क्योंकि किसी की राज्य में जिम्मेदारी है तो किसी की केंद्र में। उनकी आंखों में चुनाव बसे हुए हैं इसीलिए उन्हें वैसे भी न तो किसी के आंसू दिखते हैं न किसी के पथराए हुए चेहरे।

राजधानी में रक्तपात हुआ, देश के सर्वाधिक सुंदर पर्यटन केंद्र में सात ऐसे बिंदु बना दिए गए जो तबाही के ताबूत को उजागर कर रहे हों, 68 परिवारों को आजीवन अंधेरे में, चौंकने-ठिठकने और घुटने के लिए छोड़ दिया गया हो, किंतु इस दारुण त्रासदी के कारक आतताइयों का आज तक नाम तक न पता चल पाए तो हमें, हमारे हम होने, हम बने रहने, हमारे गिर्द रची-बसी व्यवस्था को जारी रखने देने और कुछ भी न कर पाने की तीव्र छटपटाहट के साथ जीने और जान छीनने वालों को जीते रहने देने की बेबसी पर लाज ही तो आएगी।

हमारे निर्वाचित सभासद् निर्लज्जता से लड़ रहे हैं- आपस में। आतंकवाद से मुंह छुपा रहे हैं, एक-दूजे को आंखें दिखा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा था केंद्र पोटा जैसा कानून लागू नहीं कर रहा। क्या आतंकी इसीलिए स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं क्योंकि पोटा लागू नहीं है? क्या पोटा लागू होता तो सारे आतंकी पकड़े जा चुके होते? पुलिस निदरेष नागरिकों पर अत्याचार करते हुए किसी कानून का सम्मान करती है? लागू पोटा नहीं, हमारी जांबाजी होती है।

आतंकवाद केंद्र और राज्य का विषय नहीं- हमारी जिंदगी का विषय है- क्योंकि इसमें केंद्र या राज्य किसी का कुछ नहीं जाता, हम मारे जाते हैं। मारे जाते रहे हैं और मारे जाते रहेंगे। उधर केंद्रीय एंजेंसियां राज्य को कोस रही हैं। सूचना दी थी, ध्यान ही नहीं दिया। राज्य ने उनके साथ इंटेलीजेंस शेयरिंग नहीं की। अब प्रश्न यह है कि सीमा पार से ऐसे हमलावर आखिर घुस कैसे जाते हैं हमारे देश में? केंद्रीय गुप्तचर तंत्र उन्हें देखकर करवट लेकर सो क्यों जाता है? पहले बाहर के विस्फोटक लाए जाते थे अब तमाम प्रयास आतंकियों के इसे लेकर हैं कि आतंकवाद ‘होम ग्रोन’ दिखलाई पड़े।

तीन-चार माह जयपुर में रहो, वहां की स्थितियां देखो। वहीं के कुछ देशद्रोही- जो पैसों के कारण अपनी जननी को भी अपमानित करने को उतारू हों - चुनो। वहीं से खरीदारी करो। साइकिलें भी। और तबाही मचाओ। कुछ ऐसे सबूत जानबूझकर छोड़ दो जिससे सबका ध्यान भटक जाए। जैसे की बांग्लादेशी सिगरेट का पैकेट छोड़ने पर हमने देखा। एक दिन पहले ही मुंबई विस्फोटों का एक और आरोपी रिहा हो गया।

प्रोसीक्यूशन की कमजोरी से ऐसा होता ही रहेगा। जो वाराणसी, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में हुआ- हमारे शहर में भी होगा। क्योंकि कानून का राज स्थापित करने वालों को यहां न तो उन्हीं पर अट्टहास कर रहे आंतकी दिख रहे हैं न ही बरबाद परिवारों का करुण क्रंदन सुनाई पड़ रहा है।

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आपके विचार
gyan malviya
Sunday, 13th Jul 2008, 12:34
ऎक् हि उपाय है shot out at lohkhandwala
gyan malviya
Sunday, 13th Jul 2008, 12:36
एक ही उपाय है shot out at lohkhanwala
Indian
Sunday, 13th Jul 2008, 19:12
I am fully agreed with you. Everyone knows that our police and government are useless. I believe they need to transfer this case to CBI for investigation and execution.
shiv sharma
Monday, 14th Jul 2008, 1:38
What Kalpeshji has written is simply brilliant. Actually by doing that he emphasized the importance of follow up. Had it been in news form it would have lost its impact so hats off to him for not only for raising the issue but for appropriate form of delivering too.
VS
Monday, 14th Jul 2008, 9:02
Law and Order diapeared from India long ago