Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
आमिर खान की मौजूदा पत्नी किरण की पहली फिल्म का नाम ‘धोबीघाट’ है और उनका बयान है कि यह कला फिल्म होगी।
किरण खान उसी तरह की फिल्म बनाना चाहती हैं जिस तरह की फिल्में देखना उन्हें पसंद है और उनका रुझान कला के लिए है। उन्हें व्यावसायिक सिनेमा का अर्थशास्त्र, तौर-तरीके इत्यादि समझ में नहीं आते। वे शायद घास के ढेर में तर्क की सुई खोज नहीं पा रही हैं। इस उद्योग में घास के तिनके को सुई बनाकर पेश किया जाता है और उसके सूक्ष्म छिद्र से सपनों के हाथी निकाल दिए जाते हैं।
बहरहाल किरण खान की कला फिल्म का नाम ‘धोबीघाट’ होना अजीब लगता है। यह व्यावसायिक सिनेमा का टाइटिल है। हमारे यहां ‘धोबी डॉक्टर’ बन चुकी है जिसकी प्रेरणा से मुन्नाभाई बनी थी और शायद इसी कारण अपराध सरगना मुन्नाभाई का घर धोबीघाट के किनारे बसा हुआ प्रस्तुत किया गया था। चेतन आनंद की ‘हंसते जख्म’ में पुलिस थाने में कमाल का हास्य दृश्य था जिसका केंद्रीय संवाद था कि ‘बता तेरा धोबन से क्या रिश्ता है।’ फिल्म ‘डॉन’ में ‘खइके पान बनारस वाला’ भी धोबीघाट पर फिल्माया है।
अनिल कपूर अभिनीत ‘ईश्वर’ में महत्वपूर्ण चरित्र भूमिकाएं धोबी और धोबन ने निभाई हैं। भारतीय समाज का धोबी से रिश्ता हजारों सालों से चला आ रहा है। वह एक धोबी ही था जिसके आरोप के कारण भगवान श्री राम ने गर्भवती सीता को निष्कासित कर दिया था। सारांश यह कि ‘धोबीघाट’ अवाम का अपना मनपसंद शीर्षक है।
भारतीय समाज की विविधता का भी प्रतीक धोबीघाट को मान सकते हैं कि यहां महंगे, सस्ते, महीन और मोटे सभी कपड़े साथ-साथ धुलते हैं और समाज की सारी गंदगी भी यहां धुल जाती है। मध्यम वर्ग यहीं से धुले कपड़े धारण करके ‘वाइट कॉलर’ व्यवहार करता है। धोबियों का व्यवसाय वॉशिंग मशीन घर-घर लगने से कुछ कम हुआ है गोया टेक्नोलॉजी द्वारा समाज में प्रस्तुत परिवर्तन भी धोबीघाट से जुड़े हैं।
सबसे अधिक विज्ञापन कपड़े धोने के साबुन के होते हैं और इनकी संख्या से लगता है कि भारत बहुत ही साफ-सुथरा देश है। यह बात अलग है कि उसकी महान नदियां प्रदूषित हैं और समुद्र तट गंदेले। सारे देश को साफ-सुथरे कपड़े देने वाले धोबी बमुश्किल अपना तन ढांक पाते हैं। पूरे समाज में उज्जवलता का भ्रम रचने के बाद भी नैतिकहीनता की गंदगी ढंक नहीं पाती है। सफेदी का अभी तक कोई ऐसा मीटर नहीं बना जिससे चरित्र का मूल्यांकन किया जा सके।
समाज में गलाकाट प्रतिद्वंद्वता का आभास विज्ञापन फिल्म से होता है कि तेरी कमीज मेरी कमीज से उजली क्यों हैं? विगत दशक का बयान कमीज की धुलाई वाला वाक्य ही प्रकट करता है। अब किरण खान अपनी फिल्म को भले ही कला फिल्म कहें, वह भारतीय समाज से जुड़ी फिल्म ही बनेगी।