News
Metros
Chandigarh Chandigarh नई दिल्ली/चंडीगढ़.
वह दिन दूर नहीं जब संपन्न मुल्कों का हमारे बगैर गुजारा नहीं होगा। दुनिया भर के धनी देश बूढ़े हो रहे हैं तो भारत जवान पर जवान।
देश की 60 फीसदी आबादी 25 साल से नीचे की और ऊर्जा-उत्साह से लबालब है, दुनिया जीत लेने को बेताब जैसी। इंडिया की 15 से 59 साल के बीच की कामकाजी आबादी अमेरिका से चार गुनी है।
2015 तक चीन की 50 फीसदी जनसंख्या 50 साल और 2020 तक यूरोप की ज्यादातर जनसंख्या 40 साल की उम्र पार कर जाएगी जिसका फायदा भारत को मिलेगा। ये सच सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के हवाले से हैं।
गोल्डमैन सश का अंदाजा है कि 2020 तक अमेरिका, चीन, जापान और रूस में कुल मिलाकर वर्किग एज के करीब सवा चार करोड़ कम हो जाएंगे तो हिंदुस्तान में इनकी तादात पौने पांच करोड़ ज्यादा होगी। कलाम साहब ने यूं ही कई दफे नहीं कहा है कि अगर कोई इकलौती वजह भारत को विकसित देशों का दर्जा दिला सकती है तो वो है 54 करोड़ यूथ।
विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर हम अपनी मानव विकास सूचकांक सुधार लें तो दो दशकों में ऐसा होता दिखेगा कि बूढ़े होते धनाढच्य देशों को हमारे नौजवान अपनी ऊर्जा से आगे बढ़ाएंगे। दुनिया भर में डेमोग्राफिक पैटर्न में फेरबदल से आज का युवा भारत उस मुकाम पर है जहां वह यूरोप और चीन को मात दे रहा है।
वर्ष 2015 तक वह दौर आने वाला है जब भारत अपनी 30 साल से कम उम्र की युवा वर्कफोर्स के साथ दुनिया में सबसे आगे होगा। उस वक्त देश के उन युवाओं को फायदा मिलेगा जो पढ़े-लिखे और प्रशिक्षित होंगे। अंग्रेजी पर पकड़ और बेहतर कम्युनिकेशन स्किल की बदौलत भारतीय युवा दुनिया की ज्यादातर ह्यूमन रिसोर्स जरूरतों को पूरा करेंगे। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के मुताबिक भारत का यह टैलेंट पूल अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है।
दुनिया की कई जानी मानी कंपनियों ने जनसंख्या संबंधी पैटर्न में बदलाव को भांपते हुए प्रशिक्षित और पढ़े-लिखे कर्मचारियों की खोज को लेकर भावी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। ऐसे में उन्हें भारत की युवा वर्कफोर्स बेहतर विकल्प नजर आ रही है।
कंप्यूटर बनाने वाली दुनिया की बड़ी कंपनियों में से एक आईबीएम की दुनिया के अन्य हिस्सों के मुकाबले आज भारत में ही सबसे ज्यादा वर्कफोर्स है। आईबीएम ने भारत में अपने कर्मचारियों की संख्या 70 हजार से ज्यादा कर दी है। वर्ष 2006 में यह आंकड़ा 53 हजार तक था। यही नहीं दुनिया की बड़ी आईटी और मैनेजमेंट फर्म्स ने भी अपनी एचआर पॉलिसी में भारतीयों की पसंद-नापसंद को शामिल करना शुरू कर दिया है।