उदयपुर.
दस्तावेजों में हेराफेरी कर राजस्व मंत्री रामनारायण डूडी की भतीजी को सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नौकरी दी गई है। इस मामले में मंत्री की भतीजी राजश्री चौधरी ने सामान्य श्रेणी में आवेदन किया था।
इंटरव्यू के कुछ दिन पहले ही ओबीसी का प्रमाण पत्र लगाकर उसकी श्रेणी ही बदल दी गई है। यह प्रमाण-पत्र भी इंटरव्यू से महज पांच दिन पहले ही बना था। मामला तत्कालीन कुलपति बीएल चौधरी के कार्यकाल का है।
इस मामले में संभागीय आयुक्त और कार्यवाहक कुलपति राजेश्वरसिंह की ओर से गठित एक सदस्यीय जांच कमेटी भी श्रेणी बदलने के आधार पर नियुक्ति को अवैध ठहरा चुकी है। इस मामले को चुनौती देने वाली एक याचिका हाईकोर्ट में विचाराधीन है। इसके बावजूद यूनिवसिर्टी के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट ने २५ जून २क्क्८ को इस पद पर उनकी स्थायी नियुक्ति कर दी।
फॉर्म में क्या भरा, ध्यान नहीं : राजश्री
हम जन्मजात ओबीसी में हैं। इसे कोई झुठला नहीं सकता। यूनिवर्सिटी अपने स्तर पर सभी दस्तावेज जांच चुकी है। ओबीसी सर्टिफिकेट की भी जांच हुई है। पहले दिन से ही हमने ओबीसी का सर्टिफिकेट साथ लगाया था। लेकिन इसकी अवधि छह माह होती है। आवेदन करने के डेढ़ साल बाद इंटरव्यू होने से उसकी अवधि पार हो चुकी थी इसलिए नवीनीकरण करवाकर सर्टिफिकेट दुबारा लगाया गया। फार्म में कौनसी केटेगरी भरी गई है, इसका ठीक ढंग से ध्यान नहीं है। सब कुछ नियमानुसार हुआ है।
—राजश्री चौधरी, असिस्टेंट प्रोफेसर विधि संकाय
श्रेणी नहीं बदल सकते
आवेदन करने के बाद हालांकि श्रेणी नहीं बदली जा सकती लेकिन राजश्री चौधरी के मामले में मैं कुछ भी कहने के लिए अधिकृत नहीं हूं।
—केसी गोयल, उप कुलसचिव
नियुक्ति मेरे कार्यकाल की नहीं
यह नियुक्ति मेरे कार्यकाल की नहीं है। इस बारे में पत्रावली देखकर ही कुछ कह सकते हैं।
—राजेश्वरसिंह, संभागीय आयुक्त एवं कार्यवाहक कुलपति
तो ही नियुक्ति हो सकती है
फार्म में अगर ओबीसी लिखा है और सर्टिफिकेट भी ओबीसी का लगा है तो ही नियुक्ति इस श्रेणी में हो सकती है। जिस मामले की आप बात कर रहे हैं, उसमें फार्म देखे बिना कुछ नहीं कहा सकता है।
—प्रो. बीएल चौधरी, पूर्व कुलपति
नियुक्ति अवैध, किसके निर्देश पर बदली श्रेणी
इस मामले की शिकायत होने पर संभागीय आयुक्त एवं कार्यवाहक कुलपति राजेश्वरसिंह ने सक्षम अधिकारी से जांच कर टिप्पणी मांगी। इस पर सक्षम अधिकारी ने रिपोर्ट में राजश्री चौधरी की नियुक्ति को अवैध करार दिया और इस बात पर सवाल उठाया कि उसकी श्रेणी किसके निर्देश पर बदली गई।
हाईकोर्ट में चल रहा है मामला
उधर, ओबीसी वर्ग की आवेदक अनुपमा उज्ज्वल ने श्रेणी बदलने के इस मामले को पहले ही हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है। इसे भी नजरअंदाज कर यूनिवर्सिटी ने राजश्री चौधरी को 25 जून 2008 को परमानेंट कर दिया गया। इस पर ऐतराज उठाते हुए कि प्रशिक्षण काल दो साल का होने के बावजूद एक साल में ही उसे परमानेंट कर दिया गया जो गलत है।
पहले भी हो चुकी है शिकायत
राजश्री चौधरी की नियुक्ति को लेकर पिछले साल भी शिकायत की गई थी जब उसे क्रीमीलेयर में होना बताया था। इस मामले में रिटायर्ड आरएएस अधिकारी ने जांच की और चौधरी को क्रीमीलेयर से बाहर कर दिया गया। इस संबंध में एक सप्ताह पहले जब नियुक्ति के सिलसिले में रजिस्ट्रार केसी शर्मा से बात की गई तो उन्होंने कहा कि राजश्री चौधरी मामले में क्रीमीलेयर की शिकायत हुई थी। जांच में उन्हें क्लीनचिट दे दी गई थी। श्रेणी बदलने संबंधी जांच की उन्होंने जानकारी होने से इनकार किया।
सुलगते सवाल
-आवेदक राजश्री चौधरी को यह तो याद है कि छह माह पुराने सर्टिफिकेट की मान्यता नहीं रहती है, लेकिन फॉर्म में कौनसी केटेगरी भरी है, इसकी जानकारी नहीं है। क्या ऐसा संभव है? उन्हें यह याद था कि उन्होंने सामान्य श्रेणी ही भरी है इसीलिए बीच में प्रमाण पत्र लगाने की जरूरत हुई।
-ओबीसी का प्रमाण-पत्र और अन्य दस्तावेज लगाने के लिए 18 जून 07 को पेश किए गए आवेदन पत्र पर यूनिवर्सिटी के किसी भी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे। फिर कैसे इस आवेदन को मान्य कर आवेदक को ओबीसी का मान लिया गया?
-पूर्व कुलपति चौधरी खुद इस बात को मान रहे हैं कि अगर आवेदन ओबीसी कोटे में किया गया हो और ओबीसी का प्रमाण पत्र लगाया गया हो तो ही ओबीसी कोटे में नियुक्ति हो सकती है। इतना जानते बूझते फिर क्यों उनके कार्यकाल में यह नियुक्ति हुई?
-उपकुलसचिव ने भी श्रेणी बदलने को गलत बताया है। यह जानते हुए बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट ने राजश्री की नियुक्ति को क्यों स्थायी कर दिया?
इंटरव्यू के पांच दिन पहले बना प्रमाण पत्र
राजश्री चौधरी ने अगस्त 2006 में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के संघटक लॉ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए आवेदन किया था। आवेदन में श्रेणी सामान्य ही भरी गई थी। 21 से 23 जून, 2007 तक इंटरव्यू हुए थे और नियुक्ति 25 जून, 2007 को दी गई थी। इस बीच राजश्री चौधरी ने 18 जून, 2007 को फॉर्म में शेष दस्तावेज लगाने का आवेदन प्रस्तुत किया।
इसके साथ स्नातक, एलएलबी की डिग्री और ओबीसी प्रमाण पत्र लगा दिया गया। ओबीसी प्रमाण पत्र इंटरव्यू के 5 दिन पहले 16 जून को जोधपुर की भोपालगढ़ तहसील से जारी हुआ था। इन दस्तावेजों को मूल आवेदन में जोड़ने के लिए दिए गए आवेदन पर किसी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे और ओबीसी प्रमाण पत्र के आधार पर आवेदक की श्रेणी सामान्य से बदलकर ओबीसी कर दी गई। इंटरव्यू में उसका ओबीसी में चयन हो गया।
मेरी भतीजी होना अपराध है क्या?
राजस्व मंत्री रामनारायण डूडी से सवाल
क्या राजश्री चौधरी आपकी भतीजी हैं?
-हां, क्यों भतीजी होना कोई अपराध है?
दस्तावेजों में हेरफेर कर उन्हें उदयपुर की यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति दिलाई गई है?
-मैंने कोई नियुक्ति नहीं दिलवाई। मेरी भतीजी योग्य है और अपनी योग्यता के बल पर ही नौकरी ली है।
आवेदन के समय उन्होंने सामान्य श्रेणी में फार्म भरा था। बाद में ओबीसी का प्रमाण-पत्र पेश कर ओबीसी श्रेणी में नौकरी ली है। इसमें आपने मदद की?
-क्या फार्म भरा, क्या दस्तावेज दिए यह तो विश्वविद्यालय ही बता सकता है। विश्वविद्यालय ने यदि उसकी नियुक्ति की है तो नियम-कायदों के तहत ही की होगी। इसमें यदि कोई गलती हुई है तो विश्वविद्यालय जाने।
यदि योग्यता के आधार पर चयन हुआ है तो ओबीसी का प्रमाण पत्र दस्तावेजों में क्यों शामिल करवाया?
-आप कहना क्या चाहते हैं? मेरी भतीजी होना अपराध है? इस प्रकरण में बेकार में ही आप मुझे घसीट रहे हैं।