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गुरुदत्त के जीवन पर फिल्म

परदे के पीछे.नौ जुलाई को स्वर्गीय गुरुदत्त के जन्मदिन पर उनके सुपुत्र अरुण दत्त ने बयान दिया है कि विज्ञापन फिल्मों के निर्माता शिविन्द्र डूंगरपुर के सहयोग से वे अपने पिता के जीवन से प्रेरित फिल्म बनाने के प्रयास में हैं और पटकथा पूरी करते ही आमिर खान से नायक की भूमिका करने का अनुरोध करेंगे।

ज्ञातव्य है कि फिल्मकार राकेश मेहरा भी इसी तरह की बायोपिक बनाना चाहते हैं। अरुण दत्त अपने माता-पिता के बीच हुए पत्र व्यवहार भी जारी कर चुके हैं। गुरुदत्त और गीतादत्त का प्रेम विवाह हुआ था और वह कमोवेश गौरिल्ला युद्ध की तरह रहा कि एक-दूसरे को आहत करके दोनों अपनी कमजोरियों की पहाड़ियों के पीछे छुपते रहे। शायद गीता को उम्मीद थी कि विवाह के बाद गुरुदत्त बदलेंगे (गीता के मनोरूप) और गुरुदत्त को यकीन था कि गीता का सौंदर्य और प्रेम कभी नहीं बदलेगा।

हर पति को आशा रहती है कि प्रेमिका पत्नी होने के बाद भी प्रेमिका ही रहेगी। प्रेम प्रकरण ख्वाब है और शादी हकीकत। गुरुदत्त ने उदयशंकर की नाट्यशाला में विधिवत शिक्षा ली थी और एक नाग दृश्य की उनकी कल्पना थी कि नाचने वाले के शरीर से जहरीला नाग लिपटा है और उसके फन को हाथ में लिए उसके वार से बचते हुए नर्तक नृत्य कर रहा है। गुरुदत्त ने सारा जीवन एक अदृश्य नाग को शरीर पर लपेटे हुए मृत्यु का नाच किया है।

दरअसल उनका प्रेम गीता या वहीदा से नहीं, वरन मृत्यु से रहा है क्योंकि जीवन की अर्थहीनता से वे परिचित थे-‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।’ गुरुदत्त के स्वभाव में सिद्धार्थ जैसी तड़प थी परंतु उस गहराई और महानता से वे वंचित रहे। वे जीवन दर्शन खोजने नहीं वरन एक दोषहीन संपूर्ण फिल्म बनाने निकले थे।

उन्होंने जवानी में ही ‘कश्मकश’ (द्वंद्व) नामक कहानी लिखी थी जिसका नायक सांस्कृतिक प्यास और भौतिक सफलता के द्वंद्व में फंसा है। कोई एक दशक बाद उन्होंने इसी कथा के आधार पर ‘प्यासा’ बनाई जो लगभग संपूर्ण कृति थी और अगर वादे के अनुसार दिलीपकुमार भूमिका निभाते तो गुरुदत्त को दोषहीन संपूर्ण कलाकृति बनाने का सुख मिलता। इसका यह आशय नहीं कि गुरुदत्त अच्छे अभिनेता नहीं थे और प्यासा में उन्होंने बढ़िया काम नहीं किया परंतु उनकी कल्पना के नायक का संपूर्ण दर्द केवल दिलीपकुमार प्रस्तुत कर सकते थे।

गुरुदत्त ने नृत्य निर्देशक के रूप में प्रभात स्टूडियो में काम पाया जहां देवआनंद और रहमान से उनकी मित्रता हुई। यह वह समय था जब देश की आजादी उफक (क्षितिज) पर खड़ी थी और युवा हृदय में सपने हिलोरे ले रहे थे। गुरुदत्त की प्रारंभिक फिल्मों बाज, आरपार, मि.एंड मिसेज 55 और सीआईडी से यह आभास ही नहीं होता कि यह फिल्मकार ‘प्यासा’ बनाएगा और ‘कागज के फूल’ तथा ‘साहब बीवी और गुलाम’ रचेगा।

यह शोध का विषय है कि यह आमूल परिवर्तन कैसे हुआ? उन्होंने वहीदा रहमान को एक मंच पर नृत्य करते देखा और अनुबंधित कर लिया। वह दौर नरगिस, मीना कुमारी और मधुबाला का दौर था जिनके मुकाबले वहीदा अत्यंत साधारण और सांवली सी लड़की थी। गुरुदत्त ने उन्हें ‘सीआईडी’ में अपराधी के चंगुल में फंसी लड़की की भूमिका दी थी जो हेलन या कुक्कू कर सकती थीं।

‘प्यासा’ की शूटिंग के पहले दौर में वहीदा इतनी बुरी थीं कि पूरी यूनिट उन्हें बदलने को बेकरार थी परंतु गुरुदत्त ने दूसरा दौर कलकत्ता में शूट किया और सबकी राय बदल गई। शूटिंग के दोनों दौर के बीच क्या हुआ कि वहीदा और गुरुदत्त बदल गए। वह शायद प्यार था। प्यार के अंकुरित होने का क्षण बड़ा चमत्कारिक होता है जैसे हृदय में आणविक विस्फोट हुआ हो।

गुरुदत्त की तरह आमिर भी परफैक्ट की तलाश में रहते हैं। इस प्रस्तावित फिल्म का सारा दारोमदार निर्देशक पर टिका है और अगर आमिर स्वयं निर्देशक नहीं होंगे तो यह कसरत अर्थहीन होगी।





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Abhi
Friday, 11th Jul 2008, 13:34
The article is splendid. I am fan of your selection of words, the way you narrate and explain all intricacies. It seems like you have the reading of his brain's cells. But why dilip kumar in PYASA? probably you could write another article on that.